भैंसा -गाड़ी ********** युग-युगों का धन ,भक्ति शक्ति की नाड़ी । च क्र-सुदर्शन एक ही पल है मिल जानी , जो कल था दीख रहा ,जीवन धड़कन गाड़ी । अदृश्य मान हो रही बुग्गी, घट-घाट सुहाती , नगर डगर की नरक से पार लगाती भैसा -गाड़ी । काल चाल की बात का जीवन दाब घटाती , चौकोर नाप लिए तनका, न तिरछी न आड़ी, राजमार्ग पर चलती अपनी भैसा गाड़ी । मदमस्त चक्रमणित पगुराती अपनी गाड़ी , चूं चरर का राग सुनाती ,कटरी जंगल झाड़ी। ढ़ोते जाती मल-मलिनता पत्तल -हाड़ी , सबका-सब बटोर ले-चलती भैंसा गाड़ी । जब-तक चलती रही बुग्गी बन यम की गाड़ी , जन-मन के भाग्य रहे हँसी खुशी सुरक्षित , नरक जाते जीव आयु पूर्ति या स्वयं बीमारी। या वे जाते जिनमें चलती आरी और कुल्हाड़ी । भैसों को जिनने अपनी खेती में कर ली, प्रभु ने उनकी सुधी ली भर दी उनकी झोली , युग बदला छूटे भैंसे ,यम के बने असवार , यमलोक पहुँचने लगें जीव और सवार, जीव-जगत है माया ,यहीं छूट जाएगी काया , ना रह जाएगा पैसा, सबको ले जाएगा भैंसा , चेले ढूंढते मलिनता को ढोते मन वाली गाड़ी , अब मानव भूल ...
चन्द्रदेव से मेरी बातें – बंग महिला (राजेन्द्र बाला घोष) भगवान चंद्रदेव ! आपके कमलवत् कोमल चरणों में इस दासी का अनेक बार प्रणाम | आज मैं आपसे दो चार बातें करने की इच्छा रखती हूँ | देखो , सुनी अनसुनी सी मत कर जाना | अपने बड़प्पन की ओर ध्यान देना | अच्छा , कहती हूँ , सुनों | मैं सुनती हूँ , आप इस आकाश मंडल में चिरकाल से वास करते हैं | क्या यह बात सत्य हैं ? यदि सत्य है , तो मैं अनुमान करती हूँ कि इस सृष्टि के साथ ही साथ अवश्य आपकी भी सृष्टि हुई होगी | तब तो आप ढेर दिन के पुराने , बूढ़े कहे जा सकते हैं | यह क्यों ? क्या आपका डिपार्टमेण्ट (महकमे) में ट्रांसफ़र (बदली)होने का नियम नहीं हैं ? क्या आपकी ' गवरमेण्ट ' पेंशन भी नहीं देती ? बड़े खेद की बात हैं ? यदि आप हमारी न्यायशीलता ' गवर्नमेण्ट ' के किसी विभाग में सर्विस (नौकरी) करते होते तो अब तक आपकी बहुत कुछ पदोन्नति हो गई होती | और ऐसी ' पोस्ट ' पर रहकर भारत के कितने ही सुरम्य नगर , पर्वत जंगल और झाड़ियों में भ्रमण करते | अंत में इस वृद्ध अवस्था में पेंशन प्राप्त क...
बुन्देलखण्ड के साहित्य तीर्थ चिरगाँव में जिस मनीषी ने जन्म लिया, उसी की भेरी से वणिक समाज साहित्य में सफल हो सका यह हरिवंश राय बच्चन जी ने अपनी रचनाधर्मिता में लिखा “बजती क्या मैथिलीशरण के काव्य कीर्ति की भेरी, मिलते अगर न उनको प्रेरक गुरु मुंशी अजमेरी। “ खीमल,जैसलमेर राजस्थान निवासी, डिंगल कवि एवं गायक श्री भीखा जी और उनके पूर्वज ठेठ मारवाड़ में जैसलमेर के रहने वाले थे । श्री भीखा जी को जैसलमेर से उस समय के रईस राव पालीवाल को आग्रहपूर्वक चिरगाँव बुला लिया गया था । जीवन सन्तति के सुपुत्र की कामना से भीखाजी अजमेर शरीफ जाकर प्रार्थना करने गये हुए थे । भीखा जी जैसलमेर से अजमेर आ रहे थे, अजमेर पहुँचते-पहुँचते उनके ज्येष्ठ पुत्र ईश्वरदत्त का देहांत हो गया । मार्ग में उपजे शोक को भीखा जी तब तक नहीं भुला सके जब तक चिरगाँव जाने पर प्रेमबिहारी का जन्म नहीं हो गया, अजमेरी जी के पिता भीखा जी कनकने देशी घी व्यापारी के यहाँ मुंशी का काम करने लगे थे वही से पारंपरिक मुंशी पदवी चल पड़ी वैसे देश में साहित्य के तीन मुंशी हुए कन्हैयालाल माणिकलाल,...
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