भैंसा -गाड़ी ********** युग-युगों का धन ,भक्ति शक्ति की नाड़ी । च क्र-सुदर्शन एक ही पल है मिल जानी , जो कल था दीख रहा ,जीवन धड़कन गाड़ी । अदृश्य मान हो रही बुग्गी, घट-घाट सुहाती , नगर डगर की नरक से पार लगाती भैसा -गाड़ी । काल चाल की बात का जीवन दाब घटाती , चौकोर नाप लिए तनका, न तिरछी न आड़ी, राजमार्ग पर चलती अपनी भैसा गाड़ी । मदमस्त चक्रमणित पगुराती अपनी गाड़ी , चूं चरर का राग सुनाती ,कटरी जंगल झाड़ी। ढ़ोते जाती मल-मलिनता पत्तल -हाड़ी , सबका-सब बटोर ले-चलती भैंसा गाड़ी । जब-तक चलती रही बुग्गी बन यम की गाड़ी , जन-मन के भाग्य रहे हँसी खुशी सुरक्षित , नरक जाते जीव आयु पूर्ति या स्वयं बीमारी। या वे जाते जिनमें चलती आरी और कुल्हाड़ी । भैसों को जिनने अपनी खेती में कर ली, प्रभु ने उनकी सुधी ली भर दी उनकी झोली , युग बदला छूटे भैंसे ,यम के बने असवार , यमलोक पहुँचने लगें जीव और सवार, जीव-जगत है माया ,यहीं छूट जाएगी काया , ना रह जाएगा पैसा, सबको ले जाएगा भैंसा , चेले ढूंढते मलिनता को ढोते मन वाली गाड़ी , अब मानव भूल ...
हिन्दी साहित्य की सन्त परम्परा का उद्घोष लिखित रुप में शिखर, मुखर और मानकीकरण के साथ आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जी ने ब्राह्म मुहूर्त की गंगा स्नान और तप साधना से आत्मसाध करके जनमानस के बीच पहुंचाने का काम किया , उसी गाँव के दूसरे छोर पर बैद्यनाथ द्विवेदी यानि हजारी प्रसाद जी भी निवास करते थे । किन्तु चतुर्वेदी जी का जन्म 25 जुलाई 1894 को जवही गाँव में पं०राम छबीले चतुर्वेदी के घर हुआ था और आचार्य हजारीप्रसाद जी 19 अगस्त 1907 को पैदा हुए थे । कबीर आदि सन्तों की परम्परा को चतुर्वेदी जी ने अपने स्तर से उत्तर भारत की संत परम्परा में मशहूर कर दिया, यही नहीं मीराबाई की पदावली को लिखने के लिए उनके घर चले गए और उनके इस उत्कृष्ट कार्य के लिए महाराज गायकवाड़ पांच हजार रुपए भी दिये ताकि यह ग्रन्थ प्रकाशित हो सके प्रकाशक ने मूल ग्रन्थ में इस बात का स्पष्ट विवरण दिया है । ऐसे मनीषी को भला कोई मान सकता है कि एक पेशे से वकालत करने वाला संत साहित्य जगत का प्रकाशक होगा। पं०राम छबीले चतुर्वेदी और माता सूरजा देवी की संतान परशुराम जी की प्रारम्भिक शिक्षा व्यवस्था को देखकर उनके मामा ...
भूधर से श्रीधर पाठक होने की दौड़ती लेखनी शब्दों के साथ 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 अतीत के आठवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पंजाब वर्तमान हरियाणा के सिरसा जिले से आगरा जिला अन्तर्गत फिरोजाबाद परगने के जोंधरी ग्राम में अपने संस्कारों और पाण्ड़ित्य के कारण पाठक परिवार को चांदवार महाराज चन्द्रसेन ने 14 हजार बीघा भूमि यमुना तट पर दान देकर इस परिवार को बसाया था । मल्ह जाति के एक डाकू ने इनकी जमींदारी छीन ली समय के परिवर्तन ने मल्ह जाति के करौली के प्रसिद्ध राजा सोनपाल का उस डाकू से युद्ध हुआ । पाठक परिवार की जमींदारी राजा सोनपाल के राज्य में शामिल हो गई । यह फिरोजाबाद भी इटावा जनपद से अलग नया जनपद बना था । जब राजा सोनपाल के उत्तराधिकारी राजा कर्णपाल बने थे, श्रीधर पाठक जी के पूर्वजों ने उन्हें अपनी पूर्व वृत्तांत को सुनाया तो राजा कर्णपाल ने साठ बीघा भूमि पाठक परिवार को प्रदान की । जैसे-जैसे समय बीतता गया जमींदारी का क्षरण भी होता चला गया परिवार में नाममात्र की जमीन रह गई । परिवार में वैष्णव भक्त विद्वान हुए । इस परिवार के कुशल मिश्र अच्छे कवि रचनाक...
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